Saturday, 7 June 2014

वोट दो, रियायत लो

संपादकीय वोट दो, रियायत लो(4 फरवरी) पढा। यह सही है कि चुनावों के मद्देनजर अंतरिम बजट और लेखानुदान पेश किया गया। लेकिन आम जनता को डर इस बात का है कि वोट देने के बाद सरकार रियायतों को वापस न ले ले या कुछ कर न लगा दे, क्योंकि बजट घाटे का है और अगले पांच वर्षों तक वोटर की सुध लेने का प्रश्न ही नही है। याद रहे वेतनभोगियों और मध्यवर्ग को आयकर में कोई छूट नही मिली है। आयकर विभाग ने इस संबंध में जो रियायते दी हैं वे तब तक लागू नही होंगी, जब तक उन पर नोटिफिकेशन नही आता। वोट लेने के बाद नेता कहीं बदल न जाए, इसलिए बेहतर तो यह होता कि रियायत देकर वोट मांगे जाते। कुछ भी हो, यदि हर साल चुनाव हों तो सरकार रियायतें देती रहेगी और जनता खुशहाल हो जाएगी।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स 21 फरवरी 2004 में प्रकाशित हुआ।)