Saturday, 15 March 2014

झमेले में कैस


2 जुलाई के अंक में आपकी संपादकीय टिप्पणी सही है कि कैस अधूरी प्लानिंग का नतीजा है। जब सरकार उदारीकरण के अंदर सब प्रतिबंध हटा रही है तो चैनलों के देखने पर कैस, सेट टाप बाक्स आदि की अनिवार्यता क्यों? इस विषय पर कोई कानून बनाना और दर्शकों को बाक्स लगाने के लिए मजबूर करना अनुचित है। यह विषय चैनलों और दर्शकों के बीच ही छोड देना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं। यदि दर्शक पे चैनल देखना चाहते है तो बाक्स लगवा लें। सरकार की तरफ से कोई जबरदस्ती कानून नहीं बनाना चाहिए। वैसे भी दर्शक एक समय में एक ही चैनल देख सकते हैं. बहुत सारे पे चैनलों द्वारा कैस को जबरदस्ती कानून के द्वारा लागू करवाना गलत है। इस मसले को डिमांड और सप्लाई के तहत अपने आप सुलझने के लिए छोड देना चाहिए। यदि पे चैनल घाटे में चल रहे हैं तो वे चैनल बंद कर सकते हैं। यह ध्यान रहे कि दर्शक एक समय में सिर्फ एक चैनल देखता है, चाहे प्रसारण एक सौ चैनलों का हो।


(यह पत्र 12 जुलाई 2003 को नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुआ।)