Saturday, 1 March 2014

बजट

बजट पर लेखक का नजरिया बिलकुल सही है। बजट एक ऐसी कडवी गोली है जिस के ऊपर शहद लगा कर पेश किया जाता है ताकि जनता उसे न निगलने की इच्छा के बावजूद निगलने के मजबूर हो सके। हालांकि यह गोली एक खास वर्ग के लिए उपयोगी साबित हो रही है।

आजादी के 55 वर्षों बाद भी गरीबी, बेरोजगारी, मकान, पानी, बिजली आदि की समस्याएं ज्यों की त्यों हैं जबकि करोडों की धनराशि इन समस्याऔं के निराकरण हेतु हर साल के बजट में रखी जाती है। यदि इस धनराशि का महज कुछ प्रतिशत ही ईमानदारी के साथ समस्या के निदान के रूप में खर्च किया जाता तो ये समस्याएं कब की समाप्त हो गई होती। मगर देश में व्याप्त समस्याए खुद ही बयान करती हैं कि बजट का खर्च कहां होता है।


(यह पत्र सरिता के मई (प्रथम) 2003 अंक में प्रकाशित हुआ।)