Saturday, 11 January 2014

धर्म का मुद्दा

लेख गुजरात चुनाव : धर्म का मुद्दा भारी” (जनवरी, प्रथम) पढने पर कोई आश्चर्य नही हुआ। देखा जाए तो हर पार्टी किसी न किसी धर्म, जाति, समुदाय को ले कर चुनाव लडती है. आजादी के 55 साल बाद भी सारे मुद्दे ज्यों के त्यों हैं।

यदि भाजपा पर हिन्दु पार्टी का आप लेबल लगाते हैं, तो कांग्रेस, बहुजन सामज पार्टी को क्यों छोड देते हैं? क्या यह पार्टियां किसी से कम सांप्रदायिक हैं?
बहरहाल, नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान द्वारा फैलाया आंतकवाद का मुद्दा उठा कर चुनाव जीता, क्योंकि गोधरा कांड, अक्षरधाम पर हमला और रघुनाथ मंदिर पर आतंकवादी हमलों ने गुजरातियों को झकझोर कर रख दिया है कि पाकिस्तानी आंतकवाद ज्यादा खतरनाक है। चुनावों में इसी सोच पर मत पडे और कांग्रेस, जोकि इस मुद्दे को पुरजोर ढंग से उठा नही सकी, इसलिए मत भी बटोर न पाई।
हर पार्टी के लोग एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं। धर्म व जाति का हमेशा से अपने फायदे के लिए सियासी लोगों द्वारा इस्तेमाल होता रहा है।


(यह पत्र सरिता के फरवरी (द्वितीय) 2003 अंक में प्रकाशित हुआ।)