Friday, 10 January 2014

सार्थक बातें कम शोर ज्यादा

दिसंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख संसद : सार्थक बातें कम शोर ज्यादा एक ही बात दर्शाता है कि संसद अब दंगल में बदल गई है, जहां सिर्फ पहलवानी होती है और हम दर्शकों की तरह मजे ले कर तमाशा देखते हैं। सांसद अपने स्वार्थ की खातिर संसद की कारवाई में जानबूझ कर रूकावट डालते हैं।

गुजरात के दंगों पर जितना समय संसद में बहस, शोरशराबे में खर्च किया गया, यदि उतना समय विपक्ष के सांसद गुजरात जा कर दंगा पीडितों की सहायता में लगाते तो इस से उनकी बेहतर छवि बनती और हो सकता कि गुजरात चिनावों में जनता उन्हे सिर माथे पर बैठा लेती।


(यह पत्र सरिता के फरवरी (प्रथम) 2003 अंक में प्रकाशित हुआ।)