Sunday, 3 November 2013

गृहस्थ जीवन सुखदायी


लेख धर्म की अंधी दौडनवंबर (प्रथम) 2002 सामयिक है। गृहस्थ जीवन सब से अधिक कठिन है इसलिए गृहस्थी को त्याग कर साधु या साध्वी बन जाने का मोह सब को ललचाता है। लेकिन हमें यह नही भूलना चाहिए कि जिन ऋषिमुनियों को हम अपना आदर्श मानते हैं उन्होने पहले गृहस्थ जीवन का दायित्व बखूबी निभाने के बाद तपस्या की और ज्ञान फैलाया। लेकिन हम उनके गृहस्थ जीवन को भूल कर केवल तपस्या और उपदेशों की बात करते हैं।
आज सांसरिक मूल्य लुप्त होते जा रहे हैं। हम कर्म से पहले फल की इच्छा और महत्व को अधिक पूजते हैं इसलिए गृहस्थ जीवन बीताना अत्यधिक कठिन होता जा रहा है।
यदि गृहस्थी सबसे कठिन है तो सब से अधिक सुखदायी भी यही है। अपने परिवार को अच्छे संस्कार देना, कठिन समय में एक दूसरे का साथ निभाना और समस्याऔ को साथ मिल कर सुलझाना, इसी में वास्तविक सुख है न कि आश्रमों में रहना।
आश्रमों में रहना तो जीवन से दूर भागना है। एक छोटे से टूटे मकान में सुखी जीवन के तानोंबानों के बीच संघर्ष ही असली जीवन है क्योंकि सुख और दुख दोनों जीवन के दो रूप हैं जो हर जीव को इसी संसार में भोगने हैं।
गीता के मूल मंत्र को हमें समझना चाहिए, कर्म करना हमारा धर्म है लेकिन फल की इच्छा नहीं।इस सिद्धांत पर अमल करते हुए यदि हम अपने द्वारा किए गए कर्मों का फल अपनी इच्छानुसार नहीं पाते तो भी गृहस्थ जीवन से मुंह नही मोडना चाहिए। लगातार कर्म करने से फल जरूर मिलेगा। गृहस्थ जीवन की कठनाइयों से भाग कर साधु बनना तो केवल निठल्लेपन की निशानी है।


(यह पत्र सरिता के दिसंबर (द्वितीय) 2002 अंक में प्रकाशित हुआ।)