Saturday, 23 November 2013

केलकर की कर नीति


सरित प्रवाह दिसंबर (प्रथम), 2002 अंक में प्रकाशित डा.केलकर की कर नीति पर आप के विचारों से मैं सहमत नहीं हूं। केलकर सिफारिशों में वेतनभोगी मध्यवर्गीय करदाताऔ पर और शिकंजा कसने को कहा गया है। मध्यवर्गीय वेतनभोगी खासतौर पर 2 सिफारिशों से नाखुश है। पहली, मानक कटौती को समाप्त करने की और दूसरी, धारा 88 को तहत कर छूटों को समाप्त करने की। मानक कटौती समाप्त होने पर उसे केवल 800 रूपये प्रतिमाह यात्रा भत्ते के कर छूट के मिलेगें जोकि बहुत कम हैं। मध्यवर्गीय करदाताऔं को नौकरी के लिए दिल्ली से बाहर नोएडा, गुडगांव, फरीदाबाद जाना पडता है। दिल्ली के ही अनेक इलाके दूर दूर हैं, जहां आने जाने में 800 रूपये प्रतिमाह से कहीं ज्यादा खर्च हो जाते हैं। जहां व्यापारी वर्ग फायदे में है। उदाहरण के तौर पर 2 लाख रूपये प्रति वर्ष की आमदनी वाले वेतनभोगी और व्यापारी की तुलना करें तो वेतनभोगी को केवल 800 रूपये प्रतिमाह की छूट ऊंट के मुंह में जीरा वाली कहावत को चरितार्थ करती है, जबकि व्यापारी अपने कार लोन पर ब्याज और कार के रखरखाव व पेट्रोल खर्च को अपनी आमदनी से कम कर सकता है।
दूसरी आपति धारा 88 को हटाने पर है। भारत में सरकार की ओर से व्यक्तिगत सामजिक सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में भविष्य सुरक्षा के लिए बचत अनिवार्य है। केलकर की सिफारिशों में कमाऔ, खाऔ, पीऔ और ऐश करोअमेरिका तक तो ठीक है, लेकिन भारत में नहीं।

(यह पत्र सरिता के जनवरी (द्वितीय) 2003 अंक में प्रकाशित हुआ।)