Saturday, 26 October 2013

ताडना


अक्तूबर (प्रथम) 2002 अंक में प्रकाशित लेख ताडना से सुधार नहीसार्थक है। प्रतिस्पर्द्धा के इस युग में अभिभावक अपने बच्चों से जरूरत से अधिक अपेक्षाएं रखने लगे हैं, वे चाहते हैं कि उनके बच्चे जल्दी ही सब कुछ सीख जाएं और हर क्षेत्र में प्रथम स्थान प्राप्त करें। हम यह नही सोचते कि उन के विकास में घर के वातावरण का सब से पहला योगदान होता है, उस के बाद स्कूल एवं शिक्षकों का। हर बच्चे में सोचने समझने की शक्ति अलग अलग होती है। कुछ बच्चे जल्दी सीखते हैं और कुछ देर से। स्कूलों में शिक्षकों के प्रिय जल्दी सीखने वाले बच्चे होते हैं। हमें बच्चों के मनोविज्ञान को समझना चाहिए और किसी कार्य को पूरा करने के लिए जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। मारने पीटने की जगह जिन बच्चों को उचित मार्गदर्शन दिया जाता है वे ही भविष्य में अच्छे नागरिक बनते हैं।


(यह पत्र सरिता के नवंबर (द्वितीय) 2002 अंक में प्रकाशित हुआ।)