Saturday, 28 September 2013

अब्दुल कलाम का अनुसरण


गृहशोभा अगस्त 2002 अंक में विहंगम के अंतर्गत आप के विचार एकदम सटीक हैं। सुखद बदलाव में अब्दुल कलाम पर टिप्पणी सही है। एक ऐसे व्यक्ति पर हम विश्वास कर सकते हैं, जो तमाम उम्र राजनीति से दूर रहा और भारत का प्रथम नागरिक है।
अब्दुल कलाम ने अपनी छवि बिलकुल साफ रखी है। राष्ट्रपति पद की शपथ के बाद जब वह राजघाट गए तो अपने जूते खुद उतारे, अर्दलियों की सेवा नहीं ली। अपना काम करने में कैसी शर्म। ऐसी छोटीछोटी बातें देश की जनता के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनती हैं। देश के नेताऔं को अब राष्ट्रपतिजी से सबक लेना चाहिए और अपनी भ्रष्ट छवि को सुधारने के लिए उन का अनुसरण करना चाहिए।
दिल्ली में बिजली के निजीकरण पर आप के विचार बिलकुल सामयिक हैं कि मोटी बदसूरत बेटी की शादी के बाद ससुराल में अपने आप को सुधारती है या दहेज का रोब जमाती है। आप ने शब्दों को चुन कर सही मायनों में सरकार की पोल खोली है कि निक्कमी, मोटी बदसूरत बेटी को जबरदस्ती घर से निकाल कर अपना पिंड छुडाया है।


(यह पत्र गृहशोभा के अक्तूबर 2002 अंक में प्रकाशित हुआ।)