Sunday, 22 May 2016

GST


This is with reference to the article 'GST to benefit Indian consumers' that appeared in January 15, 2016 issue. GST, no doubt, is revolutionary in Indian tax regime. Combination of various taxes into one will definitely reduce the burden of Indian industry and business.
Absorption of taxes into next level will reduce tax burden and businessmen will find rates comparative and competitive for export also. It is good for industry but I have doubts whether end users will be able to get any benefits of GST.
We see a vast difference in wholesale and retail prices. In the modern era of mall culture and big retailers, we find that they pocket the huge profits to keep themselves alive to feed huge investment and operational cost resulting in virtually no benefits for endusers.
Tie-up of brands by big wigs also results in their profits rather benefits to end-users. The cartel nexus should end so that real benefits of GST passed to end-users.


(This letter published in Business Economics on January 31, 2016)

छोटे शहरों में रोजगार


13 दिसंबर को प्रकाशित लेख 'शहर खुलता है किसी किताब की तरह' पढ़ा। यह पढ़ना मार्मिक है कि अपने शहर जाने का मन होता है, पर रोजगार की मजबूरी और दूर कर देती है। आजादी से पहले, आजादी के समय और आज 67 वर्ष बाद भी समस्या ज्यों की त्यों है। कई सरकारें आई और चली गई। पर इस समस्या पर किसी का आज भी ध्यान नही है कि छोटे शहरों और कस्बों में भी रोजगार उपलब्ध हो। आज गिनती के दस बारह शहरों में रोजगार मिलता है यहां आबादी का भारी दबाव है, बाकी स्थानों से लोग धीरे-धीरे शहरों की और पलायन कर रहे हैं। रोजगार हो तो कौन दूर परदेश जाना चाहिए। सरकार जागे तो लोग घर वापसी करें।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 17 दिसम्बर 2014 को प्रकाशित हुआ)

नोबेल का सन्देश


मलाला यूसुफजई और कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार दिए जाने के निर्णय में एक सन्देश छिपा है, जिसे भारत और पाकिस्तान को समझना होगा। दोनों देश एक तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। पाकिस्तान में आतंकवाद के कारण शिक्षा पर संकट है, तो भारत में गरीबी के कारण बच्चे नही पढ़ पाते। वहां मलाला बेहतर तालीम के लिए संघर्ष कर रही है तो यहां कैलाश बच्चों के अधिकार की लड़ाई के सूत्रधार हैं। दोनों देशों की सरकारों को रक्षा पर बेहिसाब खर्च करने की बजाय बच्चों की शिक्षा पर ज्यादा खर्च करना चाहिए। अगर भारत-पाक के हुकमरान अमन कायम करने में सफल रहे तो इससे बड़ी बात और कुछ नही हो सकती। यही नही, यह विकासशील देशों के लिए एक बड़ी प्रेणना भी बन सकता है।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 14 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित हुआ)

भारत क्या कर रहा है


पिछले एक महीने से पाकिस्तान सीमा पर अटैक कर रहा है। प्रश्न यह है कि भारत क्या कर रहा है? हर रोज की गोलाबारी में भारत के नागरिक और जवान शहीद हो रहे हैं। सिर्फ बातचीत बंद करने से इस समस्या का कोई हल नही निकलेगा। भारत के नागरिकों को यह जानने का पूरा हक़ है कि सरकार और सेना ने क्या कार्यवाही की। इसे सार्वजानिक किया जाना चाहिए।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 26 अगस्त 2014 को प्रकाशित हुआ)

इस चुनाव के बाद


विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र भारत में जनता को अपनी पसंद की सरकार बनाने का एक बार फिर सुनहरा अवसर मिला है। लोक सभा चुनाव में मताधिकार का यह एक बड़ा अवसर है। इसका पूरा विश्व आदर करता है। यहां कई बार सत्ता बदली। नए दल आए और उन्होंने देश का शासन संभाला। इस दौरान देश ने अभूतपूर्व तरक्की भी की है। अब हर देशवासी एक नई उम्मीद के साथ मतदान करेगा। लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का बर्ताव चुनाव के बाद उसी के प्रति बदल जाता है। वे अपने वादे भूल कर सिर्फ अपना हित याद रखते नज़र आते हैं। उम्मीद है कि इस चुनाव के बाद ऐसा नही होगा।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 10 अप्रैल 2014 को प्रकाशित हुआ)

Thursday, 19 May 2016

जिससे उम्मीद हो


संपादकीय 'आधी आबादी का चुनाव' (8 मार्च) में आपने जो प्रश्न उठाए हैं, देश के नेता इस समय उससे कोसों दूर भागते नज़र आते हैं। चुनाव में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल पर कोई भी दल रूचि नही दिखा रहा है। सिर्फ शोर तक सिमट कर रह गया है यह प्रश्न। कोई उत्तर देने को तैयार नही। आश्चर्य है कि जिस देश में पिछले दस वर्षों से एक महिला का राज रहा है और कई प्रदेशों में महिला मुख्यमंत्री हैं, वहां महिलाओं के उत्थान की कोई बात नही होती है। उनकी सुरक्षा के लिए भी सिर्फ कोरे भाषण दिए जाते हैं। कैबिनेट में भी न के बराबर स्थान होता है। यह ठीक है कि चुनाव में आज एक मजबूत सरकार की आवश्यकता है जो हर क्षेत्र में देश को और आगे ले जा सके। भ्रष्टाचार जैसे दानव को मार गिराना है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि बिना महिला भागीदारी के आप कुछ नही कर सकेंगे। यह भी ठीक है कि राजनीति में अपना स्वार्थ देखा जाता है। अतः महिलाएं वोट देते समय अपना स्वार्थ देखें। मतलब, वोट उसे दें, जिससे कुछ करने की उम्मीद हो। तभी हमारे नेता सुधरने का नाम लेंगे।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 11 मार्च 2014 को प्रकाशित हुआ)

Wednesday, 18 May 2016

अड़ियल रवैया


कांग्रेस के बिना शर्त समर्थन देने के बावजूद अरविंद केजरीवाल का सरकार बनाने में ना नुकर करना और शर्तों का पुलिंदा सामने रखना उनके अड़ियलपन को दर्शाता है। उन्हे सरकार बना कर अपने घोषणापत्र में कहे वायदों को पूरा करने में लग जाना चाहिए।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 19 दिसम्बर 2013 को प्रकाशित हुआ)